18.8 C
Munich
Sunday, May 24, 2026

अंग्रेज कलेक्टर को गोली मारने वाली वीर सुनीति, जिसे हम भूल गये

Must read

विशाल अग्रवाल
विशाल अग्रवाल
लेखक शिक्षक, वरिष्ठ इतिहासविद एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता

वीरांगना सुनीति का जन्म 22 मई 1917 को वर्तमान बंगलादेश के कोमिला जिले में इब्राहिमपुर गाँव में एक सामान्य मध्यमवर्गीय हिन्दू परिवार में हुआ था। उनके पिता उमाचरण चौधरी सरकारी नौकरी में थे और माता सुरसुंदरी चौधरी एक अत्यंत धार्मिक महिला जिन्होंने सुनीति के जीवन पर अत्यंत गहरा प्रभाव छोड़ा। सुनीति जब स्कूल जाने वाली छोटी सी बच्ची ही थीं, तब तक उनके दो बड़े भाई क्रांतिकारी गतिविधियों में पूरी तरह संलग्न हो चुके थे।

सुनीति, जो बचपन से ही अपनी आयु के अन्य बच्चों की तुलना में अधिक परिपक्व थीं, अपने घर और आस पास के राजनैतिक माहौल और घटनाओं से अछूती नहीं रही और इन सभी को अपने अन्दर उतारती समझती रहीं। क्रान्तिधर्मा उल्लासकर दत्त के पराक्रम के किस्सों और उनके साथ अंग्रेजों के अमानवीय व्यवहार ने उनके बालमन को गहरे तक प्रभावित किया। जब वह आगे की पढाई के कालेज में पंहुची, अपने एक सहपाठी प्रफुल्लनलिनी ब्रह्मा के जरिये युगांतर पार्टी नामक क्रांतिकारियों के संगठन के संपर्क में आयीं और देश के आज़ादी के लिए कुछ करने का स्वप्न देखने लगीं। इसी दौरान हुए एक छात्र सम्मलेन ने सुनीति और उनकी जैसी अन्य युवा लड़कियों की देश के लिए की जाने वाली गतिविधियों को अन्यी ऊर्जा दी। सुनीति अपने कालेज की साथी छात्रों की सामाजिक कार्य करने वाले समूह की कैप्टेन थीं और इस नाते विभिन्न गतिविधियों में बढचढ कर भाग लेती थीं।

उनके प्रभावी व्यक्तित्व, कुशल नेतृत्व और उत्कट देशप्रेम ने उनके जिले के कई क्रांतिकारी नेताओं का उनकी और आकृष्ट किया। शीघ्र ही उन्हें उन युवाओं के दल में चुन लिया गया जिसे आज़ादी की लड़ाई के लिए पास के पहाड़ी इलाकों में अस्त्र शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाना तय किया गया। अपने इस प्रशिक्षण के तुरंत बाद उन्हें उनकी सहपाठी शांति घोष के साथ एक अभियान के लिए चुन लिया गया, जबकि इसके पहले तक लड़कियां क्रांतिकारी गतिविधियों में परदे के पीछे कार्य करती थीं, पर अब ये तय किया गया कि कुछ अभियानों में उन्हें भेजना अधिक उपयोगी होगा। ये अभियान था, 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटका दिए गए अमर बलिदानियों भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की मृत्यु का बदला लेना ।

वो 14 दिसंबर 1931 का दिन था जब दो युवा लड़कियों ने कोमिला के जिला अधिकारी मिस्टर स्टीवेंस से उनके बंगले में भेंट कर उनसे तैराकी क्लब चलाने की अनुमति मांगी। जैसे ही उन लड़कियों का आमना सामना जिला अधिकारी से हुआ, उन्होंने उस पर गोलियां चला दी। वो दोनों लड़कियां थी-सुनीति और शांति, जिसमें सुनीति के रिवाल्वर से निकली पहलों गोली ने ही स्टीवेंस को यमलोक पहुंचा दिया। इसके बाद वहां हुयी भगदड़ और शोर में दोनों लड़कियां पकड़ी गयी और उन्हें अत्यंत निर्दयतापूर्वक पीटा गया पर वाह रे भारत की वीरांगना, दोनों युवतियों के मुंह से एक बार भी उफ़ नहीं निकला।

उन पर मुकदमा चलाया गया पर जेल और कोर्ट में उनकी मुस्कराहट, शांतचित्तता और धीरता से ऐसा शायद ही कोई रहा हो जो प्रभावित ना हुआ हो। उनको हमेशा खिलखिलाते और गाते देख कोई सोच भी नहीं सकता था कि ये दोनों युवतियां शायद अपनी मृत्यु की तरफ बढ़ रही हैं। सुनीति और शांति ने एक बलिदानी की तरह की मृत्यु का स्वप्न देखा था पर उनकी मात्र 14 वर्ष आयु होने के कारण उन्हें आजन्म कारावास की सजा सुनाई गयी। हालांकि इस निर्णय से दोनों वीरांगनाओं को थोड़ी निराशा हुयी, पर उन्होंने इस निर्णय को भी हिम्मत और प्रसन्नता के साथ स्वीकार करते हुए विद्रोही कवि क़ाज़ी नजरुल इस्लाम की कविताओं को गाते हुए जेल में प्रवेश किया।

वीरांगना सुनीति का जेल जीवन कष्टों और यातनाओं की एक लम्बी गाथा है। उन्हें फांसी ना दिला पाने से खिसियाई सरकार ने उनके जेल जीवन को जितना अधिक संभव हो सकता था, उतना क्रूर और असहनीय बनाने का प्रयास किया। उन्हें तीसरी श्रेणी का कैदी करार देते हुए जेल प्रशासन ने उन्हें बाकी सभी राजनैतिक कैदियों से अलग रखने की व्यवस्था की ताकि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा सके। उनक वृद्ध पिता की पेंशन रोक दी गयी, उनके दोनों बड़े भाइयों को बिना किसी मुक़दमे के ही जेल में डाल दिया गया और स्थिति यहाँ तक आ गयी कि बरसों उनका परिवार भुखमरी की कगार पर रहा। हालात यहाँ तक पहुँच गए कि उनका छोटा भाई कुपोषण का शिकार हो अकाल मृत्यु का शिकार हो गया पर इनमे से कुछ भी सुनीति के फौलादी हौसलों को डिगा नहीं पाया।

सात वर्ष जेल में रहने के बाद सुनीति को अन्य कई राजनैतिक कैदियों के साथ जेल से जल्द मुक्ति मिल गयी और बाहर आकर उन्होंने फिर से अपने जीवन को व्यवस्थित करने का प्रयास करना प्रारम्भ किया। उन्होंने अपनी पढाई फिर से शुरू की और कठिन परिश्रम से एम् . बी .बी .एस . की डिग्री हासिल की, जिसके बाद उन्होंने प्राइवेट प्रैक्टिस करना प्रारम्भ किया। 1947 में उन्होंने सुप्रसिद्ध ट्रेड युनियन नेता प्रद्योत कुमार घोष के साथ विवाह कर लिया और अपने परिवार में रम गयीं। पर शोषितों और वंचितों के लिए काम करना उन्होंने कभी भी बंद नहीं किया।

अपने पीछे एक बेटी को छोड़ भारत माँ की ये वीरांगना बेटी 1994 में इस नश्वर संसार को छोड़ गयी पर हर उस भारतवासी के हृदय में वे हमेशा जीवित रहेंगी जो जानता है कि ये आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल नहीं बल्कि खून बहाकर मिली है। सुनीति चौधरी और शांति घोष की यादों को जीवित रखने के उद्देश्य से सिद्धार्थ मोशन पिक्चर्स ने ये मदर्स नामक फिल्म का निर्माण किया है जिसमें श्रेया चौधरी ने वीरांगना सुनीति चौधरी का और तान्या बनर्जी ने शांति घोष का किरदार निभाया है। वीरांगना सुनीति चौधरी को कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

 विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

यह भी पढ़ें,

चंद्रशेखर आज़ाद – आज़ाद था आज़ाद हूँ आज़ाद रहूँगा.

लाला हरदयाल: जिन्होंने अमेरिका से लड़ी भारत की आज़ादी की लड़ाई!

तीन सगे भाई जो देश के लिए फांसी पर चढ़ गये

13 वर्ष की आयु में अंग्रेजों से युद्ध करते हुए वीरगति पाने वाले हरगोपाल बल

आजाद हिन्द फौज के संस्थापक, वायसराय हार्डिंग पर बम फेंकने वाले रासबिहारी बोस

उन्नीस वर्ष की आयु में फांसी पर चढ़ने वाले वीर करतार सिंह सराभा

- Advertisement -spot_img

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -spot_img

Latest article