धर्म · संस्कृति

बृहस्पति कवच

Yug Samvad Desk · 22 मई 2021 · 1 मिनट का पठन

बृहस्पति कवच

श्रीगणेशाय नमः ।

अस्य श्रीबृहस्पतिकवच स्तोत्रमन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, गुरुर्देवता, गं बीजं, श्रीशक्तिः, क्लीं कीलकं, गुरुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् । अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ॥ १॥

बृहस्पतिः शिरः पातु ललाटं पातु मे गुरुः । कर्णौ सुरगुरुः पातु नेत्रे मेऽभीष्टदायकः ॥ २॥

जिह्वां पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारगः । मुखं मे पातु सर्वज्ञो कण्ठं मे देवतागुरुः ॥ ३॥

भुजावाङ्गिरसः पातु करौ पातु शुभप्रदः । स्तनौ मे पातु वागीशः कुक्षिं मे शुभलक्षणः ॥ ४॥

नाभिं देवगुरुः पातु मध्यं पातु सुखप्रदः । कटिं पातु जगद्वन्द्य ऊरू मे पातु वाक्पतिः ॥ ५॥

जानुजङ्घे सुराचार्यो पादौ विश्वात्मकस्तथा । अन्यानि यानि चाङ्गानि रक्षेन्मे सर्वतो गुरुः ॥ ६॥

इत्येतत्कवचं दिव्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ७॥

॥ इति श्रीब्रह्मयामलोक्तं बृहस्पतिकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Yug Samvad Desk. “बृहस्पति कवच”. युगसंवाद, 22 मई 2021. https://yugsamvad.com/articles/brihaspati-kavacha

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