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संस्कृत · शास्त्रवीर सावरकर कौन थे?
प्रवक्ता · 24 जुलाई 2017 · 3 मिनट का पठन
Ø स्वतंत्रता आन्दोलन के पहले नेता जिन्होंने पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य निर्धारित किया
Ø विदेशी वस्त्रों की होलीजलाने वाले पहले नेता |
Ø भारत की स्वतंत्रता के लिएअन्तराष्ट्रीय स्तर पर क्रांतिकारी आन्दोलन खड़ा करने वाले पहले क्रांतिकारी |
Ø पहले भारतीय छात्र जिनकेक्रांतिकारी कार्यों के कारण, परीक्षा पास करने के बावजूद बैरिस्टर की डिग्री नही दीगयी |
Ø पहले भारतीय नेता जिनकीगिरफ्तारी ने इंग्लैंड में कानूनी अड़चन उत्पन्न कर दी और ‘बंदी-प्रत्यक्षीकरण एवं ‘फरार अपराधी अधिनियम’जैसे कानूनों की व्याख्या के लिए आज भी जिनके अभियोग का सहारा लिया जाता है |
Ø पहले भारतीय इतिहासकारजिनकी पुस्तक ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’ प्रकाशित होने से पहले ही जब्त कर ली गयी |
Ø पहले राजबंदी जिनके कैद सेसाहसिक पलायन एवं फ्रांस की भूमि पर गिरफ्तार होने सम्बन्धी अभियोग हेग के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में चला और अपूर्व ख्याति प्राप्त की | विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संधियों में इस अभियोग काजिक्र हुआ |
Ø विश्व के पहले क्रांतिकारीजिन्हें दो अजन्म कारावास का दंड मिला |
Ø पहले भारतीय स्नातक जिनकीडिग्री स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने के कारण विश्वविद्यालय द्वारा वापस ले लीगयी |
Ø विश्व के एकमात्र कविजिन्होंने अंदमान जेल जैसी भयंकर यातना में रहते हुए, लेखनी और कागज भी नही उपलब्धहोने पर काँटों और नाखूनों के से दीवारों पर सहस्त्रों पंक्तियाँ लिखी और उन्हेंकंठस्थ करके महाकाव्यों का रूप दिया |
Ø पहले क्रांतिकारी जिन्होंने रत्नागिरी जैसे दूरस्थ जिले में स्थानबद्ध रहते हुए, मात्र १० वर्षों में वहाँ सेअस्पृश्यता को लगभग समाप्त कर दिया |
Ø पहले भारतीयनेता/सुधारक जिन्होंने
Ø जिन्होंने गणेश उत्सव मेंतथाकथित अस्पृश्य हिन्दुओं को भी प्रवेश दिलाया
Ø तथाकथित अस्पृश्य हिन्दुओंसहित समस्त हिन्दुओं के सहभोज आयोजित किये
Ø पतितिपावन मंदिर की स्थापनाकी जो तथाकथित अस्पृश्य हिन्दुओं सहित सभी हिन्दुओं के लिए खुला है |
Ø पहले इतिहासकार जिन्होंने हिन्दुराष्ट्र के विजय का इतिहास लिखा और सिद्ध किया कि भारत का इतिहास सतत पराजय नही बल्कि संघर्ष एवं विजय का है |
Ø अपराजेय सेनानी जिन्होंनेब्रिटिश राज्य, गाँधी-अतिवाद, इस्लामिक कट्टरता तीनों से युद्ध लड़ा और कभी हार नही मानी |
Ø पहले राजनेता जिन्होंने‘आत्मार्पण योग’ द्वारा प्राण त्याग किया
ये तो परिचय के सामान्य बिंदु हैं परंतु हिन्दू महासभा का नेतृत्व करते हुए उन्होंने जो किया वह उन्हें सभी नेताओं और क्रांतिकारियों से भिन्न बनाता है।
आज भी कांग्रेस,मार्क्स, मुल्ला, मिशनरी जिससे सर्वाधिक भयभीत रहते हैं वो वीर सावरकर का ही नाम है। वैचारिक रूप से सावरकर के सामने गांधीवाद कहीं नहीं टिकता। कांग्रेसी स्वयं को उनके सामने इतने बौने महसूस करते हैं कि भाग लेते हैं।
इस्लाम से संघर्ष के विषय उतनी स्पष्ट सोच रखने वाला नेता न तो उनसे पहले कोई हुआ न उनसे बाद में कोई हो पाया। वे केवल दार्शनिक ही नहीं रहे,उन्होंने अपने विचारों को जिया और उनका जीवन उस स्तर पर पहुँच गया कि अधिकांश लोग उनकी जय जयकार तो करते हैं किंतु उनके मार्ग पर चलने का साहस नहीं कर पाते इसी कारण संघ ने धीरे धीरे किनारा किया, भाजपा आवश्यकता अनुसार ही सम्बंध रखती है।
पाकिस्तान, इस्लाम और राष्ट्रीय सुरक्षा के सम्बन्ध में उनके विचार इतने प्रासंगिक रहे कि उनके घोर विरोधी भी अपनाने को बाध्य हो गए। लंबे डग भर के चलने का साहस भले न हो पर घिसटते हुए भी भारत उन्ही के रास्ते पर बढ़ रहा है और यदि राष्ट्र को अस्तित्व में रहना है तो उनके अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं है।
वीर सावरकर चिरंजीवी हों!
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6 दिसम्बर 1992, हिन्दुत्व की महानता का स्मारक
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