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संस्कृत · शास्त्रक्षमा कीजिएगा, आपका फिल्मी डांस कला नहीं काला है
Dr Madhusudan Upadhyay · 31 दिसम्बर 2017 · 5 मिनट का पठन
आदरणीय शिव कुमार जी ने फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को लेकर कल उचित चिन्ता व्यक्त की है। एक और विधा की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। टीवी पर तो विशेषकर रियलिटी डांस शोज की भरमार आ गई है। नंगा नाचने वाले ये लोग खुद को कलाकार कहते हैं और अपने देहसटाओ प्रतियोगिता को नृत्य।
क्या dance और नृत्य एक ही बातें हैं?
आचार्य धनंजय ने दशकरुपक(1/9) में नृत्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि
“नृत्य भावों पर आश्रित होता है- ‘भावाश्रयं नृत्य’।”
अभिनय दर्पण (श्लोक 16) के अनुसार नृत्य रस, भाव तथा व्यंजना का प्रदर्शित रूप है। इस नृत्य का आयोजन सभा और राजदरबार में किया जाना चाहिए।
“रस भावव्यंजनादियुक्तम नृत्यमितीर्यते। एतन्नृत्यं महाराज सभायां कल्पयेत सदा॥”
मंदिर कितने महत्वपूर्ण होते हैं ये इस ऐतिहासिक तथ्य से जानिए कि भारतवर्ष के लगभग सभी नृत्य शैलियों का आविष्कार और विकास मंदिरों में हुए। और फिर वहाँ से राज-दरबार होते हुए आमजन तक पहुंचे। यह भी कि मंदिर केवल प्रार्थनास्थल नहीं होते।
नृत्य भारतीय सँस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है
मनुष्य का सामाजिक,धार्मिक जनजीवन नृत्य से अछूता नहीं रह सकता। वैदिक काल से नृत्य का भारतीय जनमानस से किसी न किसी प्रकार का सम्बँध रहा है। सँस्कृत के ऐक श्लोक के माध्यम से, नृत्य का महत्व, यों बतलाया गया है....
यो नृत्यति प्रहृष्टात्मा भावैरत्यन्तभक्तितः स निर्दहति पापानि जन्मान्तरगतैरपि ।।
अर्थात जो प्रसन्नचित्त हो, श्रद्धा भक्तिपूर्वक, निशच्छल भाव से नृत्य करते हैं, वे सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाते हैं।
इतना ही नहीं हमारे,धर्मगृँथ, और काव्यशास्श्त्र, यहॉ तक कि वेद भी नृत्य की महिमा से भरे हैं।
ऋग्वेद का एक श्लोक है..
"अधि-पेशॉसि वपते नूतूरिव..."
अर्थात, जिस प्रकार नर्तकी, अनेक मुद्राओं से अनेक रूप धारण करती है, वैसे ही प्रातःकाल पूर्व ऊषा अनेक रूप भरती है.
नृत्य की बॉंकी अदाओं, नर्तकियों की सुरदुर्लभ चितवन ने हमारे कवियों को भी आकर्षित किया है....
कवि केशव कहते हैं..
"नूपुर के सुरन के अनुरूप ता नै लेत पग तल ताल देत अति मन भायौ री ।.."
यानि कि हे सखि ,उसे घुँघरूओं के सुर(ध्वनि)के अनुरूप पदचाल,और उस पर तालियॉ बजाने में बडा आनन्द आया है.
विद्यापति तो नृत्य को परिभाषित करने में काफी आगे निकल गये हैं.वह कहते हैं.....
डम-डम डम्फ डिमिक डिम मादल,रून-झुन मँजिर बोल किँकिन रन रनि बलआ कनकनि,निधुबन रास तुमुल उतरोल।
पूरा अर्थ समझना तो मेरे लिये कठिन है,पर जितना समझ पाया हूँ,उसके अनुसार वे कहते हैं..डमरू की थाप और मँजीरो की मधुर ध्वनि के साथ,मिट्टी और बालू(रेत) के कण-कण में कृष्ण के नृत्य से मन भर गया।
.
हिंदी सिनेमा में, हमारे किशोरावस्था की वयःसंधि में कभी मीनाक्षी शेषाद्रि और माधुरी दीक्षित के नृत्य को देख 'क्रश' हो आया था।
आज का फिल्मी नृत्य तो जुगुप्सा उत्पन्न करता है ..अजब गजब अश्लील डांस लासा सालसा चिपक चिपकू चिपकाउ ..पता नहीं क्या क्या।
आज का नृत्य सर्कस में तब्दील हो चुका है..उस पर भरतमुनि का प्रभाव कम वात्स्यायन का प्रभाव ज्यादा है.. मानसरोगों में वृद्धि करते ये 'डांस' अगली पीढ़ी को अस्वस्थ कर सकते हैं..वर्तमान नाट्यविधा का उद्देश्य क्या रह गया है? भरतमुनि सोच रहे होंगे....-
दु:खार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम् विश्रान्ति जननं लोके नाट्यमेतद् भविष्यति...
समर्थक और ऐसे नाचने नचाने वाले कुछ भी तर्क दे सकते हैं। सही भी है,किसी भी कला के श्रेष्ठ होने का मापदण्ड क्या है? यह कौन तय करेगा कि एक प्रकार की कला दूसरे की तुलना में श्रेष्ठ है? यह विवाद कि शास्त्राीय कलाएं लोक कलाओं से श्रेष्ठ हैं, और लोक कलाऐं शास्त्राीय कलाओं के मुकाबले आम इंसान के जीवन के ज्यादा करीब हैं, देखा जाए तो यह सारे विवाद बेबुनियाद, खोखले और अनावश्यक हैं।
नृत्य का परिणाम सुख होता था,
डांस का परिणाम, शारीरिक चोट और अवसाद होता है।
एक बहुत सुंदर श्लोक याद आ गया नाट्यसंग्रह ग्रन्थ का-
यतो हस्तस्ततो दृष्टिः यतो दृष्टिस्ततो मनः। यतो मनस्ततो भावो यतो भावस्ततो रसः॥
जहाँ हाँथ जाता है वहाँ आँख जाती है जहाँ आँख वहाँ मन जहाँ मन वहाँ भाव जहाँ भाव वहाँ रस... नृत्य का यही रहस्य है !!
वहीदा रहमान, मधुबाला, आशा पारिख, हेमा मलिनी, साधना, औऱ वो,
"होठों में ऐसी बात मै दबाकर चली आई" गाने पर नृत्य करने वाली हिरोइन, जिनका नाम भूल रहा हूँ, से लेकर मीनाक्षी शेषाद्रि औऱ माधुरी दीक्षित तक।
बस यही है हिन्दी फिल्मों का स्वर्णिम नृत्य इतिहास।
समझने वाली बात तो ये है कि इनके पूर्ववर्ती कलाकार अधिकाँश तवायफों के परिवार से थी लेकिन इन लोगों ने फिल्मों में अपनी अलग मर्यादा बनाया। नैतिकता के उच्च मापदंड स्थापित किये।
एक आजकल की हीरोइनें हैं, अच्छे खासे परिवार से आकर वैश्या जैसे चरित्र निभा रही हैं। नृत्य के नाम पर उभरते कूल्हे औऱ वक्ष दिखा रही हैं। सम्भोग की मुद्रा में नृत्य दिखा रही हैं।

क्या अब मान ही लिया जाय कि शास्त्रीय नृत्य का स्वर्णिम काल समाप्ति कि ओर है ?
अब हमें उघडे जाँघ, उभरे वक्ष औऱ बेतरतीब कमर औऱ नितम्ब मटकाने को ही नृत्य मान लेना चाहिए ?
अर्थातुराणाम न सुह्रिन्न बन्धु: - कामातुराणाम न भयं न लज्जा चिंतातुराणाम न सुखं न निद्रा - क्षुधातुराणाम न बलं न तेजः।
किसी देश को बर्बाद करना हो तो सबसे सस्ता और सरल तरीका है कि उस देश के बच्चों को बाल्यावस्था में ही कामातुर बना दो।
और यह काम बड़े मनोयोग से मीडिया , सिनेमा, टीवी एवं देशी खाल ओढ़े हुए विदेशी शासकों द्वारा किया जा रहा है।
क्षमा कीजिएगा आपका फिल्मी डांस कला नहीं है, काला है !!
- डॉ. मधुसूदन उपाध्याय, लेखक भारतीय संस्कृति, इतिहास, कला, धर्म एवं आध्यात्म के गहन जानकार हैं।
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सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के सामाजिक एवं आर्थिक निहितार्थ
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लेखक वरिष्ठ वैज्ञानिक व भारतीय संस्कृति, कला एवं धर्म के गहन जानकार हैं
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