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राजनीति · इतिहाससर्फ एक्सेल का एड क्यों विभाजनकारी मानसिकता का प्रतीक है?
Abhijeet Singh · 10 मार्च 2019 · 5 मिनट का पठन
'सर्फ एक्सेल' का विज्ञापन आज चर्चा में है पर उस विज्ञापन के बीच एक गंभीर विषय भी है जिसपर मानवीय संवेदना को समझने और गढ़ने वाले लोग चिंतित नहीं होते और इनका चिंतित न होना ही भारत में अलगाववाद, विखंडन और इनके जैसी दूसरी मानसिकताओं का पोषण करती है। दिनांक 27 फरवरी 2018 को सर्फ एक्सेल के ऑफिशियल फेसबुक पेज से यह वीडियो अपलोड किया गया है|रितेश प्रज्ञांश जी लिखते हैं, वीडियो का मजमून कुछ यूं है,
"मोहल्ले में रहने वाले छोटे से मुस्लिम बच्चे को नमाज़ पढ़ने मस्ज़िद जाना है लेकिन आज होली है और मोहल्ले के दूसरे हिन्दू बच्चे छतों पे रंग गुलाल गुब्बारे और पिचकारी लिए खड़े हैं|अब छोटा मुस्लिम बच्चा नमाज़ पढ़ने कैसे जाए? उसके कुर्ते पे लाल हरा नीला गुलाबी पीला रंग किसी ने डाल दिया तो? मोहल्ले की एक अन्य हिन्दू लड़की उस मुस्लिम लड़के की दोस्त होती है| हिन्दू लड़की की मम्मी सर्फ एक्सेल यूज़ करती है इसलिए हिन्दू लड़की सायकिल ले के गली में बेखौफ निकलती है| मोहल्ले के सारे छोटे छोटे बच्चे छतों से सायकिल पे सवार छोटी सी हिन्दू लड़की पे रंग गुलाल गुब्बारों की बौछार कर देते हैं और उनका सारा रंग गुलाल गुब्बारे खर्च/खत्म हो जाते हैं|हिन्दू लड़की विजयी मुस्कान के साथ मुस्लिम दोस्त के घर के बाहर जा के सायकिल की घण्टी बजाती है, 2 मिनिट बाद हिन्दू लड़की का मुस्लिम मित्र बच्चा चकाचक सफेद कुर्ता पायजामा टोपी पहने घर से निकलता है और साइकिल के पीछे बैठ जाता है| हिन्दू बच्ची मुस्लिम बच्चे को मस्ज़िद के बाहर छोड़ देती है| मुस्लिम बच्चा हिन्दू लड़की से कहता है, अच्छा नमाज़ पढ़ने जा रहा हूँ
मूल प्रश्न ये है कि, जब त्योहार हिंदुओं का है तो उसमें मुस्लिम बच्चे का क्या काम? मुस्लिम बच्चे को होली के प्यारे प्यारे रंग गुलाल पिचकारी गुब्बारों से खौफ क्यों है? अगर गंगा जमुनी तहजीब मजबूत ही करनी है तो सर्फ एक्सेल ने मुस्लिम बच्चे को हिन्दू बच्चों के साथ रंग खेलते हुए क्यों नहीं दिखाया? ऐसे विज्ञापन हिन्दू त्योहारों पे ही क्यों बनते हैं? बकर-ईद पे ऐसे विज्ञापन क्यों नहीं बनते? होली के प्यारे खूबसूरत रंगों से डरने वाले बच्चे को क्या बकरीद पर खूनी लाल रंग के छींटों से डर नहीं लगता? और हिन्दू लड़की व मुस्लिम लड़का ही क्यों दिखाया गया? मुस्लिम लड़की और हिन्दू लड़का दिखाने से क्या डर लगता खैर जब सर्फ एक्सेल को सद्भावना फैलानी ही है तो क्यों ना मुस्लिम बच्चे को विज्ञापन में रंगने ना दिया गया| कुल मिलाकर हिन्दू त्योहारों का मखौल उड़ाते हुए नसीहत सिर्फ हिंदुओं को ही दी जानी है! क्या यह जिहाद ए मोहब्बत की ट्रेनिंग नहीं है? "

इस देश में कोई भी नहीं है जो इस बात की चिंता करने वाला हो कि अपने चारों ओर की पचासी प्रतिशत आबादी से खुद को अलग दिखने और अलग समझने की मानसिकता ने इस देश को कैसे-कैसे ज़ख्म दिये हैं। क्या कोई इस बात की चिंता करता है कि सुबह-सवेरे लगभग एक जैसे ड्रेस में स्कूल जाते बच्चों के बीच कुछ ऐसे भी बच्चे होते हैं जो उस ड्रेस से इतर बड़े कुर्ते, छोटे पायजामे और तुर्की टोपी में जब मदरसे की ओर बढ़ते हैं तो क्या होता है? ये कोई सोचता है कि एक ही देश, एक ही प्रदेश, एक ही शहर या गाँव-मुहल्ले के अंदर रहने वाले बच्चों में एक बड़ी टोली होली के रंग और पिचकारी से रंग कर भूत बना होता है और वहीं दूसरे कुछ बच्चे उस होली के दिन और भी झख सफ़ेद कपड़े में निकलता है तो क्या होता है? किसी ने कभी चिंता की है कि भारत की अपनी स्थानिक भाषा-बोली के बीच भी जब कोई बिना जरूरत कुछ बिल्कुल अलग और उल्टी भाषा पढ़ने-लिखने लग जाता है तो क्या होता है? कोई सोचता है कि एक समान नाम वाले लोगों के बीच जब कुछ बच्चे विदेशी नाम से जाने जाते हैं तो क्या होता है और क्या होता है जब समाज के कॉमन त्योहारों और परंपराओं से एक समूह खुद को विलग कर खड़ा हो जाता है?
होता ये है कि पाँच-छह साल की उम्र में ही उन छोटे समूह के अंदर विखंडन और अलगाववाद का बीजारोपण होने लगता है जिसे पनपने के लिए अलग से मजहबी तालीम न भी दी जाये तो भी वो उतना ही असरकारी होता है और छोटी उम्र में ही पड़ा विखंडन का ये बीज एक दिन इतना बड़ा हो जाता है कि पूरा राष्ट्र उसका विषफल महसूस करता है।
सर्फ एक्सेल के विज्ञापन की ही बात कर लीजिये और सोचिये कि एक छोटा बच्चा जो शायद बहुसंख्यक मोहल्ले में ही रहता है पर उसके अंदर अलगाववाद की जड़ कितनी गहरी है कि उसे अपने सफ़ेद कपड़े पर रंग का एक कतरा भी बर्दाश्त नहीं है, उसके अंदर जड़वाद इतना समाया हुआ है जिसके चलते वो जानता है कि हँसी-ख़ुशी का एक त्यौहार भी उसके लिये कुफ़्र ही है जिसके ज़द में आकर उसकी इबादत क़ुबूल नहीं होगी। वो इस छोटी सी उम्र में ही अपने कट्टरपंथ पर कितना डिगा है कि साइकल पर जब वो बच्ची उसे सुरक्षित (बिना रंग का) उसके इबादतगाह तक छोड़ती है तो वो ऐसा महसूस करता है कि उसने कुफ़्र और काफिरों पर अंततः विजय पा ही ली।
पाँच-छह के उम्र से खुद को अलग समझने की मानसिकता धीरे-धीरे विभाजन और अंततः पूरे विखंडन तक पहुंचती है जिसका विष-परिणाम देश कई बार देख चुका है। इसी मानसिकता ने अफगानिस्तान को भारत भूमि से अलग किया, इसी जड़वाद ने 1947 का विभाजन करवाया और दुर्भाग्य से यही मानसिकता आज भी उसी रूप में है जो एक नहीं बल्कि कई-कई विभाजनों का बीज अपने गर्भ में पाल रही है।
सर्फ एक्सेल के इस विज्ञापन के मायने ये भी है। उस विज्ञापन के विरोध मात्र से ही ये समस्या खत्म नहीं होने वाली क्योंकि उस विज्ञापन के बंद होने से भी ये मानसिकता खत्म नहीं होगी और ये चिंता की बड़ी बात है। इसलिये जरूरी है कि अलगाववाद और विखंडन की हर मानसिकता के निस्तारण के उपाय ढूंढें जाये। और कहने की जरूरत नहीं है कि बीमारी गंभीर है तो उपाय भी उसी के अनुरूप ही हो।
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प्रखर हिन्दू विचारक थे नोबेल पुरस्कार विजेता विद्याधर नायपॉल
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लेखक भारतीय एवं अब्राहमिक इतिहास, साहित्य व संस्कृति के गहन जानकार एवं राष्ट्रवादी विचारक हैं
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