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धर्म · संस्कृतिश्रीराम का वनगमन और वेदज्ञ ब्राह्मणों की प्रार्थना
Shri Dwivedi · 8 अगस्त 2020 · 3 मिनट का पठन
जब भगवान श्रीराम वनगमन कर रहे थे तो उनके पीछे नगर के सब लोग चलने लगे। उन लोगों में तीन प्रकार के ब्राह्मण थे। कोई वयोवृद्ध थे, कोई ज्ञानवृद्ध थे तो कोई तपोवृद्ध थे। वयोवृद्धों में कुछ तो इतने वृद्ध थे जिनकी गर्दन पर उनके सिर काँप रहे थे। वे ब्राह्मण दूर से पुकार रहे थे-
हे वेगवान, अच्छी जाति के घोड़ों! लौटो, लौट आओ, श्रीरामचन्द्र जी का हित करो।
समस्त जीवों में श्रवण शक्ति होती है किंतु अश्वों की श्रवणशक्ति अत्यंत तीव्र होती है, तुम हमारी यह प्रार्थना सुनो और लौट आओ।
हम जानते हैं कि तुम्हारे स्वामी का मन सरल और कोमल है। वे वीर हैं, शुभ एवं दृढ़ व्रतधारी हैं। इसलिए (तुम्हे) इनको अयोध्या पहुंचाना चाहिए न कि अयोध्या से दूर ले जाना चाहिए।
जब अपने पीछे पैदल आते उन वृद्ध ब्राह्मणों के कातर वचनों को महाराज मनु के वंशज, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी ने सुना तो वे जानकी और लक्ष्मण समेत रथ से उतर पैदल ही वनगमन करने लगे। क्योंकि सदाचारयुक्त, दयालु श्रीराम को पैदल आते उन ब्राह्मणों को रथ से दूर रखना इष्ट नहीं था।
जब ब्राह्मणों ने देखा कि प्रार्थना करने पर भी श्रीराम वापस नहीं आ रहे और वन की ओर बढ़े जा रहे हैं तब वे अत्यंत विकल एवं शोकसंतप्त होकर बोले-
हे राम, तुम ब्राह्मणों के हितकारी हो, अतः तुम्हारे पीछे केवल ब्राह्मणों का समूह ही नहीं आ रहा बल्कि उनके कंधों पर अग्निदेव भी आ रहे हैं।
देखो वाजपेय यज्ञ से जो हमें छत्र प्राप्त हुए हैं, जो शरदकालीन मेघ के समान शुभ्र हैं, वे तुम्हारे पीछे पीछे आ रहे हैं। हम इन छत्रों से तुम्हें छाया करेंगे ताकि तुम्हें घाम से कष्ट न हो।
हे वत्स, हमारा मन अभी तक तो वेद के स्वाध्याय में लगा रहता था, अब उस ओर न लग कर तुम्हारे वनगमन की ओर लगा हुआ है।
हमारा परम् धन जो कि वेद है वो हमारे हृदय में है। और हमारी स्त्रियाँ पातिव्रत्य धर्म से अपनी रक्षा करती हुई घर में रहेंगीं। अब हमें अन्य किसी बात का निश्चय नहीं करना है, हम तुम्हारे साथ चलने का निश्चय कर चुके हैं। किंतु जब तुम हमारी आज्ञा का उलंघन करोगे तब धर्म के मार्ग पर चलना क्या कहलावेगा?
हे राम, हम और अधिक क्या कहें, हम हंस के समान श्वेत बालों वाले (अत्यंत बूढ़े) होकर भी तुमको शाष्टांग प्रणाम कर रहे हैं।
उनमें से जो तत्वज्ञ ब्राह्मण थे, वे श्रीराम को साक्षात श्रीमहाविष्णु समझ कर शाष्टांग प्रणाम कर रहे थे। अन्य जो प्रेमवश उन्हें जाने नहीं देना चाहते थे वे यह सोचकर उन्हें दण्डवत प्रणाम कर रहे थे कि अपने क्षत्रिय धर्म में सदैव स्थित रहने वाले राजकुमार श्रीराम वृद्ध ब्राह्मणों को दण्डवत प्रणाम करता देखकर लौट आएंगे।
वे ब्राह्मण बोले- हममें अनेक ऐसे हैं जो आरम्भ कर चुके यज्ञों को मध्य में छोड़कर आये हुए हैं, हे पुत्र, उन यज्ञों की पूर्ति तुम्हारे लौटने पर निर्भर करती है।
यह केवल हम ही नहीं कह रहे किंतु, पशु, पक्षी, वृक्षादि भी यही प्रार्थना कर रहे हैं। अपने भक्तों के इस स्नेह को सफल करो।
देखो, ये ऊंचे ऊंचे वृक्ष भी तुम्हारे साथ जाना चाहते हैं किंतु इनकी जड़ें भूमि में गहरी गड़ी होने के कारण, साथ चलने में असमर्थ होकर, वायुवेग से हिलती हुई अपनी शाखाओं से तुम्हारे वनगमन का निषेध करके ये चिल्ला रहे हैं। देखो पक्षियों ने भी उड़ना और चुगना बन्द कर दिया है। ये वृक्ष रूपी गृहों बैठे हुए, तुमको प्राणिमात्र पर दया करने वाला जान, वनगमन न करने के लिए आग्रह कर रहे हैं।
इस प्रकार श्रीराम जी को लौटाने के लिए चिल्लाते हुए उन ब्राह्मणों के चलते चलते तमसा नदी दिख पड़ी जो मानो मार्ग रोककर भगवान के जाने का निषेध कर रही थी।
(श्रीम्द्वाल्मिकीयरामायण अयोध्याकाण्ड)
श्री राम का सत्य सर्वप्रिय धर्म स्वरूप..
क्या रावण ने सीताजी का स्पर्श नहीं किया था? बड़ा प्रश्न!
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Shri Dwivedi. “श्रीराम का वनगमन और वेदज्ञ ब्राह्मणों की प्रार्थना”. युगसंवाद, 8 अगस्त 2020. https://yugsamvad.com/articles/shreeraama-kaa-vanagamana-aura-vedajna-braahmanon-kee-praarthanaa
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