युगसंवाद · राजनीति · इतिहास
राजनीति · इतिहासडॉ. हरवंशलाल ओबराय - हिन्दू संस्कृति के प्रखर संरक्षक
Gunjan Aggrawala · 28 जुलाई 2021 · 5 मिनट का पठन
महान् कर्मयोगी डॉ. हरवंशलाल ओबराय का जन्म दिनांक 21 अक्टूबर, 1925 को रावलपिण्डी के एक पंजाबी खत्री दम्पति श्री धर्मचन्द्र एवं रामकौर ओबराय के घर में हुआ था। सन् 1947 में देश-विभाजन के पश्चात् उनको सपरिवार भारत आना पड़ा। हरवंशलाल ओबराय जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता थे। बाल्यकाल से ही अत्यन्त तेजस्वी श्री हरवंशलाल ने अल्पायु में ही दर्शनशास्त्र, भारतीय इतिहास एवं हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर तथा सन् 1948 में जालन्धर से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उसी वर्ष उन्हें गाँधी-हत्याकाण्ड में दोषी ठहराकर दिल्ली जेल में बन्द कर दिया गया, जहाँ से कुछ दिनों पश्चात् निरपराध सिद्ध होकर मुक्त हुए। सन् 1948 से 1963 तक दिल्ली तथा उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा विश्वविद्यालयों के विभिन्न महाविद्यालयों में दर्शनशास्त्र का अध्यापन किया। इससे पूर्व सन् 1960 और 61 में वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गये। इस दौरान उनका स्वावलम्बी अध्ययन भी जारी रहा तथा वे स्वयं को प्राच्यविद्या के एक अधिकारी विद्वान् के रूप में प्रतिष्ठित करने में भी सफल रहे। वह अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन, पंजाब के अध्यक्ष, भारतीय इतिहास संकलन समिति के पूर्वांचल-प्रमुख तथा विश्व हिंदू परिषद्, राँची के संस्थापक थे। ‘विश्व के विभिन्न मतावलम्बियों पर हिंदू संस्कृति का प्रभाव व प्रसार’ उनके अध्ययन के मुख्य विषय था।
डॉ. हरवंशलाल ओबराय की प्रतिभा व मौलिक अन्वेषण-कार्य से प्रभावित होकर सन् 1963 में यूनेस्को ने उनको यूरोप, अमेरिका, कनाडा और एशियाई देशों के विश्वविद्यालयों में ‘हिंदू संस्कृति एवं दर्शन’ विषय पर व्याख्यानमाला प्रस्तुत करने के लिए आमन्त्रित किया। इस व्याख्यानमाला के अंतर्गत डॉ. ओबराय ने 126 देशों की यात्राएँ कीं और वहाँ के विश्वविद्यालयों में हिंदू-संस्कृति पर सहस्राधिक सारगर्भित व्याख्यान दिये। इस दृष्टि से डॉ. हरवंशलाल ओबराय बीसवीं शती के विवेकानन्द थे। इस यात्रा-शृंखला में ओबरायजी ने न केवल व्याख्यान दिये अपितु उन देशों में हिंदू राजा-महाराजा, साधु-संन्यासियों द्वारा किए गए धर्म-प्रचार के अवशेषों का भी अध्ययन करने के साथ वहाँ से पुरातात्त्विक महत्त्व के चित्रों, मूर्तियों और अभिलेखों का भी संग्रह किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार विदेशों में डॉ. हरवंशलाल ओबराय का प्रथम भाषण मिशिगन विश्वविद्यालय (सं.रा. अमेरिका) के सभागार में 11 सितम्बर, 1963 को प्रथम विश्व धर्म संसद् (शिकागो, 1893 ई.) की 70वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में आयोजित सम्मेलन में हुआ। उस सम्मेलन में इस ‘द्वितीय विवेकानन्द’ को सुनने के लिए श्री चन्द्रकांत बिड़ला उपस्थित थे। वह डॉ. ओबराय के व्याख्यान से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रख्यात समाजसेवी बाबू जुगलकिशोर बिड़ला (1883-1967) को सहमत कर बी.आई.टी. के अंतर्गत दर्शन एवं मानविकीशास्त्र के स्वतंत्र संकायों की स्थापना कर डॉ. ओबराय को अध्यक्ष बनाया। यह डॉ. हरवंशलाल ओबराय का नहीं, उनके प्रखर पाण्डित्य का सम्मान था।
सुप्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक और प्राच्यविद्, भारतीय जनसंघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा ‘सरस्वती विहार’ (इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ़ इण्डियन कल्चर, हौज़ख़ास, दिल्ली) के संस्थापक डॉ. आचार्य रघुवीर (1902-1963), डॉ. हरवंशलाल ओबराय के प्रेरणास्रोत थे। सन् 1963 में डॉ. ओबराय के विदेश-प्रवास के समय भारत में आचार्य रघुवीर का एक मोटर-दुर्घटना में स्वर्गवास हो गया था। उनके आकस्मिक निधन से डॉ. ओबराय के हृदय को बड़ा आघात लगा था और उन्होंने डॉ. रघुवीर के कार्य को आगे बढ़ाने का निश्चय करके सन् 1965 में राँची के अपर बाज़ार में ‘संस्कृति-विहार’ (एकेडमी ऑफ़ इण्डियन कल्चर) नामक एक संस्था की नींव डाली। बाबू जुगलकिशोर बिड़ला इस संस्था के संरक्षक थे। इस संस्था के अन्तर्गत डॉ. ओबराय ने बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश एवम् अन्य निकटवर्ती राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों का तूफ़ानी दौराकर ईसाई पादरियों के षड्यन्त्र का मुँहतोड़ उत्तर दिया और असंख्य वनवासी बन्धुओं की सनातनधर्म में वापसी करायी। सन् 1975 से 1977 के आपातकाल के दौरान ओबरायजी क्रमशः राँची, गया और हज़ारीबाग़ सेण्ट्रल जेल में रखे गये। हज़ारीबाग़ सेण्ट्रल जेल में मेरे पूजनीय पिता श्री कृष्णमोहन प्रसाद अग्रवाल, ओबरायजी के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए। ओबरायजी वार्ड नं. 6 में रखे गए थे, लेकिन पिताजी ने जेल के चीफ वार्डन से निवेदन करके ओबरायजी को अपने वार्ड (स्पेशल वार्ड नं. 1) में स्थानान्तरित करवा लिया। इस वार्ड में नित्य शाखा के अतिरिक्त समय-समय पर अनेक महापुरुषों की जयन्तियाँ मनाई जाती थीं, जिसमें मुख्य वक्ता श्री ओबराय जी ही होते थे। एक बार जेल में भगत सिंह की जयन्ती के दौरान ओबरायजी ने कुछ प्राकृतिक सामग्री से रंग तैयार करके भगत सिंह का चित्र बनाया, जिसे पिताजी जेल से छूटने के पश्चात् अपने घर ले आये। वह पेण्टिंग वर्षों तक उनके शयनकक्ष में टंगी रही और बाद में उसे सरस्वती शिशु मन्दिर को भेंट कर दिया गया।
डॉ. ओबेराय द्वारा जेल प्रवास के दौरान बनाई गई भगत सिंह की तस्वीर
हज़ारीबाग़ सेण्ट्रल जेल में पिताजी को लगभग 10 महीने ओबरायजी का सान्निध्य मिला, जिनकी मधुर स्मृतियाँ आज भी पिताजी के स्मृति-पटल पर अंकित हैं। 1977 में जेल से छूटने के पश्चात् पिताजी ने 6 अवसरों (2 बार मकर संक्रान्ति के उपलक्ष्य में, 1 बार वर्ष प्रतिपदा के उपलक्ष्य में, 1 बार स्वामी विवेकानन्द-जयन्ती के उपलक्ष्य में, 1 बार असम-समस्या पर और 1 बार भगवद्गीता-जयन्ती के उपलक्ष्य में) ओबराय जी को अपने गाँव जरीडीह बाज़ार में आमन्त्रित किया और उनका व्याख्यान करवाया। ओबराय जी के कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए पिताजी और उनके अनन्य मित्र श्री Shiv Hari Banka जी पूरी ताक़त लगा देते थे। ओबरायजी मेरे पैतृक निवास में ही ठहरते थे।
सितम्बर, 1983 ई. में इन्दौर में आयोजित शिक्षा-सम्मेलन में ‘वेद और विज्ञान’ विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में भाषण देने के लिए जब ओबराय जी राँची से इन्दौर जा रहे थे, उसी यात्रा के दौरान 19 सितम्बर को रायपुर के पास एक आततायी ने चलती रेल से धक्का देकर उनकी हत्या कर दी। 20 सितम्बर, 1983 को राँची में हरवंशलाल ओबराय का पार्थिव शरीर संसार से विदा हुआ, पर यशःकाया अजर-अमर बन गयी।
— कुमार गुंजन अग्रवाल, शोधकर्ता, महामना मालवीय मिशन
साहित्य क्षेत्र में गुण्डागर्दी की कभी न भूलने वाली दास्तान..
इस लेख को उद्धृत कीजिए
Gunjan Aggrawala. “डॉ. हरवंशलाल ओबराय - हिन्दू संस्कृति के प्रखर संरक्षक”. युगसंवाद, 28 जुलाई 2021. https://yugsamvad.com/articles/do-haravanshalaala-obaraaya-hindoo-sanskriti-ke-prakhara-sanrakshaka
https://yugsamvad.com/articles/do-haravanshalaala-obaraaya-hindoo-sanskriti-ke-prakhara-sanrakshaka · देखा गया

दिनांक 26 नवम्बर, 1984 को ग्राम जरीडीह बाज़ार, ज़िला बोकारो, झारखण्ड में जन्मे गुंजन अग्रवाल प्राच्यविद्या, भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म-दर्शन, भारतीय-वाङ्मय, हिंदी-साहित्य, आदि के क्षेत्र में एक जाने-माने हस्ताक्षर हैं। एतद्विषयक शोधपरक निबन्धों, ग्रन्थों में गहरी अभिरुचि रखनेवाले गुंजन अग्रवाल विगत लगभग दो दशक से स्वाध्याय एवं लेखन, सम्पादन और प्रकाशन के कार्य से सम्बद्ध हैं। इस क्षेत्र के देश के मूर्धन्य विद्वानों पर अपनी विद्वत्ता की अमिट छाप छोड़ी है। गुंजन अग्रवाल भारतीय इतिहास की भ्रांतियों पर विगत कई वर्षों से कार्य कर रहे हैं। विशेषकर पौराणिक कालगणना के आधार पर भारतीय इतिहास के तिथ्यांकन (क्रोनोलॉजी-निर्माण) में इन्होंने अद्भुत सफलता प्राप्त की है। वेदों का रचनाकाल, श्रीराम का काल-निर्धारण, श्रीराम की ऐतिहासिकता, रामकथा का विश्वव्यापी प्रसार, महाभारत-युद्ध की तिथि, श्रीकृष्ण का समय, भगवान् बुद्ध का समय, आद्य शंकराचार्य का काल-निर्धारण, भारतीय इतिहास का परम्परागत कालक्रम, भारतीय इतिहास-लेखन, इस्लाम-पूर्व अरब में हिन्दू-संस्कृति, यूरोपीयों द्वारा भारतीय कला और बौद्धिक सम्पदा की लूट, आदि अनेक विषयों में इनके लिखे शोध-पत्रों ने उल्लेखनीय ख्याति अर्जित की है। सन् 1998 से प्रकाशन कार्य से एवं 2004 में मात्र 20 वर्ष की अवस्था में लेखन-कार्य से जुड़े गुंजन अग्रवाल का साहित्यिक जीवन पटना से प्रकाशित ‘सनातन भारत’ से प्रारम्भ हुआ। ये ‘सनातन भारत’ (हिंदी-मासिक) में सम्पादक-मण्डल सदस्य; ‘आरोग्य संहिता’ (हिंदी-द्वैमासिक) में उप सम्पादक; ‘पिनाक’ (हिंदी-त्रैमासिक) में प्रबन्ध-सम्पादक; ‘पगडंडी’ (हिंदी-त्रैमासिक) में सम्पादक; ‘इतिहास दर्पण’ (अर्धवार्षिक शोध-पत्रिका) में सह-सम्पादक और पटना की सुप्रतिष्ठित ‘पटना-परिक्रमा’ (हिंदी-वार्षिक पटना बिजनेस डायरेक्टरी) में प्रधान सम्पादक रह चुके हैं। प्राच्यविद्या की सुप्रतिष्ठित हिंदी-मासिकी ‘दी कोर’ के 30 अंकों का सम्पादन किया है। सम्प्रति दिल्ली से प्रकाशित शोध-पत्रिका ‘सभ्यता-संवाद’ में कार्यकारी सम्पादक के पद पर कार्यरत हैं। गुंजन अग्रवाल अपने पिता श्री कृष्णमोहन प्रसाद अग्रवाल के द्वारा बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बनाए गये। प्रारम्भ से ही इन्हें साहित्यिक वातावरण प्राप्त हुआ है। इन्होंने 2004-’05 तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, पटना महानगर के कोषाध्यक्ष; 2006-’09 तक स्वदेशी जागरण मंच, पटना महानगर के सह-विचार मण्डल प्रमुख; 2011-’12 में भारतीय इतिहास संकलन समिति, दक्षिण बिहार के सह-सचिव तथा 2012 से 2016 तक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नयी दिल्ली में शोध-सहायक के रूप में कार्य किया। आप ‘बिहार-हिंदी-साहित्य-सम्मेलन’, पटना के संरक्षक-सदस्य और ‘अखिल भारतीय नवोदित साहित्यकार परिषद्’, काशी के सदस्य हैं। गुंजन अग्रवाल की अनेक पुस्तकें, शताधिक शोध-निबन्ध एवम् आलेख देश की महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित व विद्वानों द्वारा प्रशंसित हुए हैं। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं : ‘हिंदू इतिहास की स्मरणीय तिथियाँ’ (2006), ‘भगवान् बुद्ध और उनकी इतिहास-सम्मत तिथि’ (2009), ‘महाराजा हेमचन्द्र विक्रमादित्य : एक विस्मृत अग्रदूत’ (2014); उपर्युक्त पुस्तकें देश के ख्यातिलब्ध समीक्षकों द्वारा समीक्षित एवं प्रशंसित हुई हैं। 2008 में इनके द्वारा संपादित महामनीषी ‘डॉ. हरवंशलाल ओबराय रचनावली’ का भी प्रकाशन हुआ है। इनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने साहित्य भारती प्रकाशन (पटना), वैदिक पब्लिशर्स (नयी दिल्ली) एवम् अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना (नयी दिल्ली) से प्रकाशित शताधिक पुस्तकों का अनाम सम्पादन किया है। गुंजन अग्रवाल ने अनेक प्रादेशिक, राष्ट्रीय एवम् अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, व्याख्यानमालाओं, सम्मेलनों, शिविरों, आदि में सहभागिता की है एवम् अनेक में शोध-पत्र वाचन किया है। अनेक शैक्षणिक आयोजनों में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में आमन्त्रित हुए हैं। वर्ष 2018 में इनको ‘प्रभाश्री ग्रामोदय सेवाश्रम’ द्वारा भारतीय इतिहास एवं संस्कृति की संरक्षा में सतत संलग्नता के लिए ‘प्रभाश्री-सम्मान’ से अलंकृत किया गया है।
संबंधित आलेख

कन्यादान हो या वरदान! अब आप ही बताईये क्या बुराई है?
क्या कन्यादान सिर्फ खैरात है? क्यों होता है कन्यादान और क्या यह स्त्री का अपमान है? जानिए हिन्दू विवाह संस्कार में कन्यादान का सही अर्थ, उसका सांस्कृतिक और वैदिक महत्व। पढ़ें वरदान बनाम कन्यादान की सच्ची व्याख्या, ब्रह्म विवाह का रहस्य और उन कुतर्कों का उत्तर जो हिन्दू परम्पराओं को गलत साबित करते हैं।
22 सितम्बर 2021 · 5 मिनट का पाठ
सर्वधर्मसमभाव के प्रतिकार में आत्मघाती कमियां
विगत ९० वर्षों में मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति बढ़ जाने से भारतीय संस्कृति को बहुत क्षति पहुंची है। अली मौला अल्लाह को ईश्वर के समतुल्य दिखा कर छद्म धर्मनिरपेक्षता ने हमारी मूल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना को पंगु बना दिया है। परिभाषिक दृष्टि से भी रिलीजन और मजहब धर्म से भिन्न
18 सितम्बर 2021 · 8 मिनट का पाठ
युधिष्ठिर - सार्वभौम दिग्विजयी हिन्दूराष्ट्र निर्माता सम्राट
जैसा कि युधिष्ठिर जी आदि पर विवाद देखने को मिलता है तो हमें महाभारत में ही देखना चाहिए कि युधिष्ठिर आदि पाण्डव स्वयं से भी शक्तिशाली या धर्मपुंज थे अथवा नवयुगी दुष्प्रचार अनुसार मात्र श्रीकृष्ण की दया पर ही लंबित थे क्योंकि ऋषि बार बार उनको धर्मराज कह रहे तब उनका वचन मिथ्या नहीं
1 सितम्बर 2021 · 13 मिनट का पाठ