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संस्कृत · शास्त्रहिन्दू ग्रन्थों के अनुसार कौन होता है ब्राह्मण ?
अजेष्ठ त्रिपाठी · 9 अगस्त 2017 · 4 मिनट का पठन
सामान्य तौर पर हम जाति के आधार पर ही किसी को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र मानते हैं परन्तु हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार किसी के जन्म से अधिक महत्व उसके कर्मों का है। कर्मों के आधार पर ही उसे वास्तविक रूप में ब्राह्मण या अन्य कुछ कहा जा सकता है। यहाँ हम देखेंगे कि हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण होने के लिए एक व्यक्ति को कैसा होना चाहिए, उसकी क्या क्या योग्यताएं होनी चाहिए...
भविष्य पुराण के अनुसारः
निवृत्तः पापकर्मेभ्योः ब्राह्मणः से विधीयते । शूद्रोSपिशीलसम्पन्नो ब्राह्मणदधिकोभवेत् ॥ भविष्य पुराण . अ. 44।जो पापकर्म से बचा हुआ है, वही सच्चे अर्थों में ब्राह्मण है। सदाचार सम्पन्न शूद्र भी ब्राह्मण से अधिक है। आचारहीन ब्राह्मण शूद्र से भी गया बीता है। विवेक, सदाचार, स्वाध्याय और परमार्थ ब्राह्मणत्व की कसौटी है। जो इस कसौटी पर खरा उतरता है, वही सम्पूर्ण अर्थों में सच्चा ब्राह्मण है।
वृहद्धर्ग पुराणके अनुसारः
ब्रह्मणस्य तू देहो यं न सुखाय कदाचन । तपः क्लेशाय धर्माय प्रेत्य मोक्षाय सर्वदा ॥ वृहद्धर्ग पुराण 2/44॥ब्राह्मण की देह विषयोपभोग के लिये कदापि नहीं है। यह तो सर्वथा तपस्या का क्लेश सहने और धर्म का पालन करने और अंत मे मुक्ति के लिये हि उत्पन्न होती है। ब्राह्मण का अर्थ है विचारणा और चरित्रनिष्ठा का उत्त्कृष्ट होना।
मनुस्मृति के अनुसारः
सम्मनादि ब्राह्मणो नित्यभुद्विजेत् विषादिव । अमृतस्य चाकांक्षे दव मानस्य सर्वदा ॥ मनुस्मृति 1/162॥ब्राह्मणको चाहिये कि वह सम्मान से डरता रहे और अपमान की अमृत के समान इच्छा करता रहे।
वर्ण व्यवस्था की सुरुचिपूर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण को समाज में सर्वोपरि स्थान दिया गया है। साथ ही साथ समाज की महान जिम्मेदारियाँ भी ब्राह्मणोंको दी गयीं हैं। राष्ट्र एवं समाज के नैतिक स्तर को कायम रखना , उन्हें प्रगतिशीलता एवं विकास की ओर अग्रसर करना , जनजागरण एवं अपने त्यागी तपस्वी जीवन में महान आदर्श उपस्थित कर लोगों को सत्पथ का प्रदर्शन करना, ब्राह्मण जीवन का आधार बनाया गया।
इसमें कोई संदेह नहीं कि राष्ट्र की जागृति, प्रगतिशीलता एवं महनता उसके ब्राह्मणों पर आधारित होती हैं। ब्राह्मण राष्ट्र निर्माता होते हैं, मानव हृदयों में जनजागरण का गीत सुनाता है, समाज का कर्णधार होता है। देश, काल, पात्र के अनुसार सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन करता है और नवीन प्रकाश चेतना प्रदान करता है। त्याग और बलिदान ही ब्राह्मणत्व की कसौटी होती है।
राष्ट्र संरक्षण का दायित्व सच्चे ब्राह्मणों पर ही हैं। राष्ट्र को जागृत और जीवंत बनाने का भार इनपर ही है।
यजुर्वेद के अनुसारः
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। -यजुर्वेद
ब्राह्मणत्व एक उपलब्धि है जिसे प्रखर प्रज्ञा, भाव-सम्वेदना, और प्रचण्ड साधना से और समाज की निःस्वार्थ अराधना से प्राप्त किया जा सकता है। ब्राह्मण एक अलग वर्ग तो है ही, जिसमे कोई भी प्रवेश कर सकता है, बुद्ध क्षत्रिय थे, स्वामि विवेकानंद कायस्थ थे, पर ये सभी अति उत्त्कृष्ट स्तर के ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण थे। ”ब्राह्मण” शब्द उन्हीं के लिये प्रयुक्त होना चाहिये, जिनमें ब्रह्मचेतना और धर्मधारणा जीवित और जाग्रत हो, भले ही वो किसी भी वंश में क्युं ना उत्पन्न हुये हों।
ऋग्वेद के अनुसारः
ब्राह्मणासः सोमिनो वाचमक्रत , ब्रह्म कृण्वन्तः परिवत्सरीणम् । अध्वर्यवो घर्मिणः सिष्विदाना, आविर्भवन्ति गुह्या न केचित् ॥ ऋग्वेद 7/103/8 ॥
ब्राह्मण वह है जो शांत, तपस्वी और यजनशील हो। जैसे वर्षपर्यंत चलनेवाले सोमयुक्त यज्ञ में स्तोता मंत्र-ध्वनि करते हैं वैसे ही मेढक भी करते हैं। जो स्वयम् ज्ञानवान हो और संसार को भी ज्ञान देकर भूले भटको को सन्मार्ग पर ले जाता हो, ऐसों को ही ब्राह्मण कहते हैं। उन्हें संसार के समक्ष आकर लोगों का उपकार करना चाहिये।
यास्क मुनि के अनुसार-
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः। वेद पाठात् भवेत् विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।। अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।
जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वहब्राह्मण नहीं, याचक है। ब्राह्मणपर प्रहार नहीं करना चाहिए और ब्राह्मणको भी उस प्रहारक पर कोप नहीं करना चाहिए। ब्राह्मणवह है जो निष्पाप है, निर्मल है, निरभिमान है, संयत है, वेदांत-पारगत है, ब्रह्मचारी है, ब्रह्मवादी (निर्वाण-वादी) और धर्मप्राण है।
जिसने सारे पाप अपने अंतःकरण से दूर कर दिए हैं, अहंकार की मलीनता जिसकी अंतरात्मा का स्पर्श भी नहीं कर सकती, जिसका ब्रह्मचर्य परिपूर्ण है, जिसे लोक के किसी भी विषय की तृष्णा नहीं है, जिसने अपनी अंतर्दृष्टि से ज्ञान का अंत देख लिया, वही अपने को यथार्थ रीति से ब्राह्मण कह सकता है।
मित्रों, ब्राह्मणकी यह कल्पना व्यावहारिक है या नहीं यह अलग विषय है। किन्तु भारतीय सनातन संस्कृति के हमारे पूर्वजों व ऋषियों ने ब्राह्मण की जो व्याख्या दी है उसमें काल के अनुसार परिवर्तन करना हमारी मूर्खता मात्र होगी। वेदों-उपनिषदों से दूर रहने वाला और ऊपर दर्शाये गुणों से अलिप्त व्यक्ति चाहे जन्म से ब्राह्मण हो या ना हो लेकिन ऋषियों को व्याख्या में वह ब्राह्मण नहीं है। कृण्वन्तो विश्वमार्यम।
– श्री अजेष्ठ त्रिपाठी, लेखक मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया निवासी हैं और हिन्दू धर्म, शास्त्र, संस्कृति व इतिहास के गहन जानकार और शोधकर्ता हैं
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