संस्कृत · शास्त्र

कौनसे आठ प्रकार के होते हैं ब्राह्मण ?

अजेष्ठ त्रिपाठी · 9 अगस्त 2017 · 3 मिनट का पठन

यूं तो ब्राह्मणों का वर्णन अनेक ग्रन्थों में मिलता है पर सबसे उत्तम तो वेद और स्मृतियों में ही मिलता है। ब्राह्मण होने का अधिकार सभी को है चाहे वह किसी भी जाति, प्रांत या संप्रदाय से हो। लेकिन ब्राह्मण होने के लिए कुछ नियमों का पालन करना होता है। उन्हीं नियमों के पालन से आठ ब्राह्मणों के आठ स्तर या आठ प्रकार बन जाते हैं, जिन्हें हम इस लेख में देखेंगे।

स्मृति-पुराणों में ब्राह्मणों के 8 भेदों का वर्णन मिलता है:-

मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि। ब्राह्मणों के 8 प्रकार श्रुति में बताए गए हैं। इसके अलावा वंश, विद्या और सदाचार से ऊंचे उठे हुए ब्राह्मणों को ‘त्रिशुक्ल’ कहते हैं। ब्राह्मणों को विप्र और द्विज भी कहा जाता है।

1. मात्र : ऐसा व्यक्ति जो जाति से ब्राह्मण है लेकिन ब्राह्मणोचित कर्म नहीं करता उसे मात्र कहा गया है। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से कोई ब्राह्मण नहीं कहलाता। बहुत से ब्राह्मण ब्राह्मणोचित उपनयन संस्कार और वैदिक कर्मों से दूर हैं, तो वैसे मात्र हैं। उनमें से कुछ तो यह भी नहीं हैं। वे बस शूद्र हैं। वे तरह के तरह के देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और रा‍त्रि के क्रियाकांड में लिप्त रहते हैं। वे सभी राक्षस धर्मी हैं।

2. ब्राह्मण : ईश्वरवादी, वेदपाठी, ब्रह्मगामी, सरल, एकांतप्रिय, सत्यवादी और बुद्धि से जो दृढ़ हैं, वे ब्राह्मण कहे गए हैं। तरह-तरह की पूजा-पाठ आदि पुराणिकों के कर्म को छोड़कर जो वेदसम्मत आचरण करता है वह ब्राह्मण कहा गया है।

3. श्रोत्रिय : स्मृति अनुसार जो कोई भी मनुष्य वेद की किसी एक शाखा को कल्प और छहों अंगों सहित पढ़कर ब्राह्मणोचित 6 कर्मों में सलंग्न रहता है, वह ‘श्रोत्रिय’ कहलाता है।

4. अनुचान : कोई भी व्यक्ति वेदों और वेदांगों का तत्वज्ञ, पापरहित, शुद्ध चित्त, श्रेष्ठ, श्रोत्रिय विद्यार्थियों को पढ़ाने वाला और विद्वान है, वह ‘अनुचान’ माना गया है।

5. भ्रूण : अनुचान के समस्त गुणों से युक्त होकर केवल यज्ञ और स्वाध्याय में ही संलग्न रहता है, ऐसे इंद्रिय संयम व्यक्ति को भ्रूण कहा गया है।

6. ऋषिकल्प : जो कोई भी व्यक्ति सभी वेदों, स्मृतियों और लौकिक विषयों का ज्ञान प्राप्त कर मन और इंद्रियों को वश में करके आश्रम में सदा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए निवास करता है उसे ऋषिकल्प कहा जाता है।

7. ऋषि : ऐसे व्यक्ति तो सम्यक आहार, विहार आदि करते हुए ब्रह्मचारी रहकर संशय और संदेह से परे हैं और जिसके श्राप और अनुग्रह फलित होने लगे हैं उस सत्यप्रतिज्ञ और समर्थ व्यक्ति को ऋषि कहा गया है।

8. मुनि : जो व्यक्ति निवृत्ति मार्ग में स्थित, संपूर्ण तत्वों का ज्ञाता, ध्याननिष्ठ, जितेन्द्रिय तथा सिद्ध है उसे ‘मुनि’ कहते हैं।

– श्री अजेष्ठ त्रिपाठी, लेखक मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया निवासी हैं और हिन्दू धर्म, संस्कृति, इतिहास के गहन जानकार और शोधकर्ता हैं

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अजेष्ठ त्रिपाठी. “कौनसे आठ प्रकार के होते हैं ब्राह्मण ?”. युगसंवाद, 9 अगस्त 2017. https://yugsamvad.com/articles/kaunase-aatha-prakaara-ke-hote-hain-braahmana

अजेष्ठ त्रिपाठी

ऑस्ट्रेलिया निवासी लेखक, हिन्दू धर्म, संस्कृति और इतिहास के गहन जानकार और शोधकर्ता हैं।

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